[vc_row full_width=”stretch_row_content” css=”.vc_custom_1479971768012{background-image: url(http://templeinhimachal.com/wp-content/uploads/2016/11/border.png?id=44) !important;background-position: center !important;background-repeat: no-repeat !important;background-size: contain !important;}”][vc_column width=”1/6″][/vc_column][vc_column width=”2/3″][vc_empty_space height=”50px”][vc_custom_heading text=”चनौर मंदिर ठाकुर द्वारे का इतिहास” font_container=”tag:h2|font_size:35|text_align:center|color:%23bf0000″ use_theme_fonts=”yes”][vc_text_separator title=”” i_icon_fontawesome=”fa fa-sun-o” i_color=”custom” color=”custom” el_width=”50″ add_icon=”true” i_custom_color=”#bf0000″ accent_color=”#bf0000″][vc_column_text]
चनौर गॉंव व्यास नदी के किनारे 3 मील की दुरी पर दक्षिण की और माता चिन्तपूर्णी का मंदिर तथा ५(5) से ६(6) मिल की दुरी पर उत्तर की ओर माता शीतला जी का मंदिर स्थित है। यहाँ द्वापर युग में पाण्डवों के द्वारा बनवाए हुए तीन मन्दिर है। पहला मंदिर माता दुर्गा चण्डी का है। दूसरा मन्दिर मूर्ति श्री लक्ष्मी नारायण जी का है। वहीं तीसरा मन्दिर श्री रूद्र भगवान (शिव महादेव) जी का है। पहला मन्दिर माता चण्डी दुर्गा जी और तीसरे मन्दिर में रूद्र जी की मूर्ति की स्थापना पाण्डवों ने स्वयं की हुई है तथा इन दोनों मन्दिरों के मध्य में छोटा मन्दिर (गुफा) है। जिसमें अभी मूर्ति श्री लक्ष्मी नारायण विराजमान है। यह मन्दिर उस समय खाली था परन्तु पाण्डवों ने कहा था कि किसी समय में इस मन्दिर में भगवान की मूर्ति विराजमान होगी तथा पाण्डवों ने कह दिया था कि इस गांव का नाम मूर्ति श्री लक्ष्मी नारायण जी के विराजमान होने के बाद चनौर पड़ेगा । राजाओं का राज था। कांगड़ा के राजा घमण्ड चन्द तथा महाराजा संसार चन्द उस समय के उपस्थित राजा थे। दूसरे राजा रियासत डाडा सिवा के थे। पाण्डवों के कथाअनुसार इन्ही राजाओं के समय में चनौर से अंदाजन आधे मील के फासले पर चपलाह नामक स्थान पर हल चलाते-चलाते भूमि में से मूर्ति प्रकट हुई। हल जो था वह फंस गया। हल चलाने वाले किसान ने हल को पीछे खींच कर बड़ी सावधानी से इसको निकाला। निकाल कर देखा तो यह मूर्ति थी। राजा घमण्ड चन्द तथा रियासत डाडा सिवा के राजा का यहाँ आपसी किनारा था ,दोनो राजाओं को सूचित कर दिया गया। उनके साथ प्रसिद्व विद्वान् पधारे। देखा तो मूर्ति लक्ष्मी नारायण की थी कि लक्ष्मी नारायण जी की मूर्ति प्रकट होगी। डाडा सीवा रियासत के राजा ने इस मूर्ति की चपलाह गांव में ढाई मील दक्षिण की और टिपरी का बाग नामक स्थान की एक जगह है वहाँ पर इसे विराजमान करना चाहा। जब उसने इस मूर्ति की सुखपाल में बैठा कर चार पुरुषों से उठवा कर टिपरी के वाग में रख दिया, स्थान निशिचत करने के बाद जब फिर उस सुखपाल को उठाने लगे तो सुखपाल इतना वजनदार हो गया कि राजा ने 50 आदमी लगा दिए परन्तु उठाया नहीं गया।
राजा साहिब को सबपन हुआ कि मुझे स्नान कराओ, पानी के लिए उन्होंने खडड में छोटा सा गढ़ा किया और पानी नहीं था। अब कुछ दिन के लिए मूर्ति वही रही क्योंकि मूर्ति बज हो गई और दोनों राजाओं की आपसी बहस हो गई। राजा घमण्ड चंद जो कि कांगड़ा के राजा थे उनको भगवान जी ने स्वपन में कहा कि मुझे उस मन्दिर में विराजमान किया जाये जोकि पांडवों द्वारा मन्दिर बने हुए है और मध्य वाला स्थान असली है। उस स्थान पर स्थापना की जाये। जिस सुखपाल में मूर्ति को एक ही पुरुष ने अपने कन्धे पर उठाकर रख लिया, मूर्ति फूल की तरह हल्की हो गई तथा मूर्ति को जिस रास्ते से वापिस लाया गया। उसी रास्ते में पानी अधिक से अधिक निकलता गया। चण्डी दुर्गा जी, रूद्र जी के मध्य में खाली मन्दिर में स्वपन के अनुसार भगवान् जी को विराजमान कर दिया गया, असली नाम इस गाँव का कस्वा है।
इन तीन मंदिरों के कारण इसका नाम चनौर पड़ा। दुर्गा चण्डी से ‘च ‘शव्द लिया गया। नारायण जी से ‘न’ शव्द लिया गया। रूद्र जी से ‘र’ शव्द लिया गया। च-न -र शव्द इन तीनों को मिलाकर चनर अक्षर बना। इसकी सुद्धि करके चनौर नाम पड़ा। ज्यों-ज्यों पानी जमीन से निकलता गया उस पानी की कूल को भगवान् के मंदिरों तक लाया गया। अब वह पानी बारह मास चलता रहता है। मन्दिर के चारों और पानी कूलों द्वारा चलता रहता है। गर्मियों-सर्दियों में एक जैसा चलता रहता है। इस पानी को राजा राम सिंह जो रियासत डाडा सिवा के थे, कूल वनवा कर अपनी रियासत को ले चले, जब उन्होंने टिपरी वाग से जहां कि गढ़ा खोदा कर भगवान् को स्नान करवाया था वहां कूल निकाली तो पानी उस कूल से निचे निकला वहां खुश्क हो गया। फिर दोबारा उन्होंने निचे कूल निकलवाई तो पानी उससे भी निचे निकला और राजा को स्वपन दिया कि यह मेरा पानी है यह मेरे चरणों में बहेगा। यह आपकी रियासत को नहीं जा सकता। फिर राजा ने पानी ले जाने के विचार को बन्द किया था। उन कूलों के निशान थोड़े अभी भी मिलते है।
राजा घमण्ड चन्द के पुरोहित कशमीरी खानदान के थे उसी समय से इस मन्दिर की पूजा कशमीरी पण्डतों द्वारा चली आ रही है। हजारों यज्ञ वर्ष में यहाँ होते है। ज्यादा लोग यज्ञ दान करते है। इसी अनुसार मूर्ति स्थापना के वाद रियासत अम्ब का राजा 125 मन चावल पके तो उसने घमण्ड चन्द से कहा कि, इतना कौन खायेगा इतने लोग आए कि आधे भूखे गए, जिससे राजा की वहुत नीरादरी हुई। जब वह वापिस रियासत अम्ब को गया तो भगवान् का कोप उस पर पड़ गया। हर समय उसे लक्ष्मी नारायण की मूर्ति दिखाई देती और उसे मालूम पड़ता कि मेरे दरवार में इतना घमण्ड दूसरी वार वह पच्चीस मन चावल पैदल चल कर आया और नगें पाँव परिक्रमा की। वही 25 मन चावल हजारों लोग खा कर चले गए। इस प्रकार निश्चित से एक सेर भी लेकर आता है। उसे पूरी तरह बरकत मिलती है। यह बहुत साक्षात् प्रत्य्क्ष देव स्थान है। इसी प्रकार अनेक कथाएँ है जो बिलकुल प्रत्य्क्ष और सच्ची है जो कि बीत चुकी है।
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