[vc_row full_width=”stretch_row” css=”.vc_custom_1479449385244{background-image: url(http://templeinhimachal.com/wp-content/uploads/2016/11/border.png?id=44) !important;background-position: center !important;background-repeat: no-repeat !important;background-size: contain !important;}”][vc_column][vc_empty_space height=”110px”][vc_custom_heading text=”सावन के सोमवार व्रत” font_container=”tag:h2|font_size:35|text_align:center|color:%23bf0000″ use_theme_fonts=”yes”][vc_text_separator title=”” i_icon_fontawesome=”fa fa-sun-o” i_color=”custom” i_size=”sm” color=”custom” el_width=”50″ add_icon=”true” accent_color=”#bf0000″ i_custom_color=”#bf0000″][vc_column_text]
सतयुग काल में सनत कुमारों ने एक बार भगवान् महादेव शिव से श्रावण महीने के महात्मय के बारे में पूछा और यह भी जिज्ञासा प्रकट की कि उन्हें यह महीना क्यों प्रिय है? भोलेनाथ ने इसका अर्थ समझाते हुए उनको एक कथा सुनाई। जिसमें कथा के अनुसार देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग करते समय यह इच्छा की थी की वह प्रत्येक जन्म में वह भगवान् शंकर को ही पति के रूप में वरण करेंगी। अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती से सावन के महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और अंततः भोलेनाथ को पति के रूप में प्राप्त किया। इसी कारण सुयोग्य वर प्राप्ति के लिए कुंवारी लड़कियां सावन सोमवार का व्रत विशेष श्रद्धा के साथ करती हैं,जिससे उनको मनचाहा वर मिलता है।
[/vc_column_text][vc_custom_heading text=”व्रत का विधान” font_container=”tag:h2|font_size:35|text_align:center|color:%23bf0000″ use_theme_fonts=”yes”][vc_text_separator title=”” i_icon_fontawesome=”fa fa-sun-o” i_color=”custom” i_size=”sm” color=”custom” el_width=”50″ add_icon=”true” accent_color=”#bf0000″ i_custom_color=”#bf0000″][vc_column_text]
सोमवार व्रत में सम्पूर्ण शिव परिवार की पूजा की जाती है। यह व्रत स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं। व्रती यथशक्ति पंचोपचार या षोडशोपचार विधि और पूजन सामग्री से पूजा कर सकता है। शास्त्रों के मुताबिक सोमवार व्रत की अवधि सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक है। सोमवार व्रत में उपवास रखना श्रेष्ठ माना जाता है, किन्तु उपवास न रखने की स्थिति में व्रती के लिए सूर्यास्त के बाद शिव पूजा करने के उपरांत एक बार भोजन करने का विधान है। सोमवार व्रत रात्रि भोजन के कारण नक्तव्रत भी कहलाता है। सोमवार के व्रत के दिन प्रातः काल ही स्नान ध्यान के उपरांत सफेद वस्त्र धारण करें। इसके पश्चात शांत और सात्विक चित्त से वृत का संकल्प लें। मंदिर या घर पर श्री गणेश जी की पूजा के साथ शिव पार्वती और नंदी बैल की पूजा की पूजा की जाती है। पूजा में मुख पूर्व दिशा या उत्तर दिशा में करके बैठें। इस दिन प्रसाद के रूप में जल, दूध, दही, शहद, घी, शकर, जनेऊ, चन्दन, रोली, बेल पत्र, भांग, धतूरा, धूप, दीप और दक्षिणा के साथ ही नंदी बैल के लिए चारा या आटे की पिन्नी बनाकर भगवान् पशुपति नाथ का पूजन किया जाता है। शिव की पूजा-आराधना में गंगाजल से स्नान ओर भस्म अर्पण का विशेष महत्व है। सुगन्धित श्वेत पुष्प लाकर भगवान् शिव व् गणेश के जिन स्त्रोतों मंत्र ओर स्तुति की जानकारी हो उसका पाद करें। श्री गणेश व् शिव की आरती सुगन्धित धूप, घी के पांच बत्तियों के डीप और कर्पूर से करें। अंत में गणेश ओर शिव से घर और परिवार की सुख समृद्धि की कामनायें करें। पूजा के दौरान शिव के पंचाक्षरी मंत्र – ॐ नमः शिवाय का विशेष रूप से जाप किया जाता है। स्वास्थ्य लाभ के लिए इस महीने में महामृत्युंजय मंत्र का जाप भी बहुत फल दायी होता है। निकट के शिवालय में इस दिन भगवान् शिव का जलाभिषेक जरूर करना चाहिए। सभी सोमवारों में यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। सुहागिन स्त्रियों को इस दिन व्रत रखने से अखंड सौभाग्य प्राप्त होता है। विद्यार्थियों को व्रत रखने से विद्या और बुद्धि प्राप्त होती है। सद्गृहस्थ नौकरी पेशा या व्यापारी को श्रावण के सोमवार व्रत रखने से समृद्धि की प्राप्ति होती है। श्रावण सोमवार व्यक्ति को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों से समृद्ध बनाते हैं। पारिवारिक कलह को शांत करने और एक सुखद गृहस्थ जीवन की प्राप्ति केलिए भी शरण सोमवार का व्रत एक अमोघ साधन है।
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