वट वृक्ष (बरगद) की पूजा

इस वृक्ष में भगवान व्रह्मा, भगवान विष्णु, भगवान महेश और भगवान शिव भी वास करते है। इस वृक्ष की पूजा माता तुलसी,धर्मवृक्ष (पीपल) के समान की जाती है। वट (बरगद) के वृक्ष को हिन्दू धर्म में बहुत प्रकार के व्रत,त्योहारों में इसकी पूजा की जाती है। इसलिए इस वृक्ष को अक्षय वट वृक्ष भी कहा जाता है। यह वृक्ष बहुत ज्यादा समय तक अक्षय (बहुत सालों) रहता है। अखंड सौभाग्य-आरोग्य के भी इस वृक्ष की पूजा की जाती है। एक कथा के अनुसार इस वट वृक्ष के नीचे पूजा करने के पश्चात सावित्री नामक एक स्री ने अपने पति को पनर्जीवित किया था। तभी से लेकर इस प्रमुख व्रत को वट सावित्री के नाम से जाना जाता है। इस व्रत की पूजा जेष्ठ कृष्ण की अमावस्या के दिन होती है। पवित्र ग्रन्थों में कहा गया है की जेष्ठ कृष्ण की अमावस्या के दिन जोभी मनुष्य वट वृक्ष की पूजा करता है। वह सौभाग्य एवं धन की प्राप्ति और सुख-शांति की भी प्राप्ति होती है। यह वृक्ष तपस्या और साधना के लिए भी प्रसिद्ध  है। भगवान शिव और भी अनेक ऋषि मुनि इस वट वृक्ष के नीचे समाधि लगाकर तपस्या और साधना करते थे।

तहं पुनि संभु समुझिपन आसन।

बैठे वटतर, करि कमलासन।।

भावार्थ- अर्थात कई सगुण साधकों, ऋषियों यहां तक कि देवताओं ने भी वटवृक्ष में भगवान विष्णु की उपस्थिति के दर्शन किए हैं। -रामचरित मानस

वट वृक्ष का महत्व हमारे जीवन में इसके फल,जड़,छाल,फूल,पत्ती आदि कई प्रकार के रोगों का जड़ से नाश करता है। आयुर्वेद में भी इसका काफी प्रयोग होता है। इसे प्रयोग करने से पहले हमे किसी विशेषयज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।

हमारे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड प्राप्त करने और ऑक्सीजन छोड़ने की भी इसकी अधिक क्षमता है। इसलिए पर्यावरण सन्तुलन की अहम भूमिका के कारण यह वटवृक्ष बहुत महत्व पूर्ण है । हमारे वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करने और ऑक्सीजन छोड़ने की भी इसकी अधिक क्षमता  है

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