करवा चौथ व्रत

हिंदू सनातन धर्म में करवा चौथ सुहागिनों का एक महत्वपूर्ण त्योहार माना जाता है। इस त्योहार पर महिलाएं अपने हाथों में मेहंदी लगाकर, चूड़ियां पहन कर व सोलह श्रृंगार कर अपने पति की पूजा कर व्रत का पारायण करती हैं। वह अपने सुहाग (पति) की दीर्घायु के लिए इस व्रत को करती हैं और भगवान् से अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं।
सुहागिन या पतिव्रता स्त्रियों के लिए करवा चौथ बहुत ही महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है। इसमें गणेश जी का पूजा करने के बाद उन्हें पूजन दान से प्रसन्न किया जाता है। इसमें गैहहिं का करवा भर के पूजन किया जाता है और विवाहित लड़कियों के ससुराल में चीनी के करवे भर कर उनके पीहर से भेजे जाते हैं।

करवा चौथ व्रत की पूजन विधि

करवा चौथ व्रत की आवश्यक संपूर्ण पूजन सामग्री को इकट्ठा कर लें।

व्रत के दिन प्रातः उठकर स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें- “मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये”

इस दिन इस्त्रियां पूरा दिन निर्जला रहें।

दीवार भगवान् का चित्र लगा कर पूजा करें व चावलों के घोल से करवा चित्रित करें। इसे वर कहते हैं। चित्रित करने की कला को करवा धरना कहा जाता है।

आठ पूरियों की अठावरी बनाएं हलवा पूरी, व मीठा पकवान बनाएं।

पीली मिट्टी से माँ गौरी का चित्र बनाएं और उनकी गोद में गणेशजी बनाकर बिठाएं या बाजार से चित्र ले कर भी पूजा कर सकते हैं।

गौरी को लकड़ी के आसन पर बिठाएं। चौक बनाकर आसन को उस पर रखें। गौरी को चुनरी ओढ़ाएं। बिंदी आदि सुहाग सामग्री से गौरी का श्रृंगार करें।

जल से भरा हुआ लोटा रखें और भेंट देने के लिए मिट्टी का करवा लें। करवे में गेहूं और ढक्कन में शक्कर का बूरा भर दें, उसके ऊपर दक्षिणा रखें रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएं।

गौरी-गणेश और चित्रित करवा की परंपरानुसार पूजा करें। पति की दीर्घायु की कामना करें व इस मंत्र का जाप करें – “नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌।
प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे”॥

करवे पर 13 बिंदी रखें और गेहूं या चावल के 13 दाने हाथ में लेकर करवा चौथ की कथा कहें या सुनें। कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपनी सासुजी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और करवा उन्हें दे दें।

तेरह दाने गेहूं के और पानी का लोटा या करवा अलग रख लें, रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद छलनी में से उसे देखें और चन्द्रमा को अर्घ्य दें।

करवा चौथ व्रत की कथा

एक समय की बात है एक साहूकार के सात लड़के और एक लड़की थी सेठानी के सहित उसकी बहुओं और बेटी ने करवा चौथ का व्रत रखा था। रात्रि को साहूकार के लड़के भोजन करने लगे तो उन्होंने अपनी बहन से भोजन के लिए कहा। इस बात पर बहन ने उत्तर दिया- भाई! अभी तक चाँद नहीं निकला है, उसके निकलने पर अर्घ्य देकर भोजन करुँगी। बहन की बात सुनकर बहियों ने नगर से बाहर जाकर आग जला दी और चलनी ले जा कर उसमें से प्रकाश दिखाते हुए उन्होंने बहन से कहा-बहन! चाँद निकल आया है अर्घ्य देकर भोजन कर लो। यह सुनकर उसने अपनी भाभियों से कहा की आओ तुम भी चन्द्रमा को अर्घ्य दे दो परंतु वे इस बात को जानती थीं। उन्होंने कहा-बहन! अभी तक चाँद नही निकला, तुम्हारे भाई तुमको धोखा देकर तुमको अग्नि का प्रकाश चलनी से दिखा रहे हैं। भाभियों की बात सुनकर भी उसने कुछ ध्यान न दिया व भाइयों द्वारा दिखाए प्रकाश को ही अर्घ्य देकर भोजन कर लिया इस प्रकार व्रत भंग करने से गणेश जी उस पर अप्रसन्न हो गए।
इसके बाद उसका पति सख्त बीमार पड़ गया। जब उसको अपने किये हुए दोषों का पता लगा तो उसने पश्चाताप किया। गणेश जी की प्रार्थना करते हुए सबसे आशिर्बाद ग्रहण करने में ही मन को लगा दिया। इस प्रकार प्रकार उसकी श्रद्धा भक्ति को देखकर भगवान् गणेश उस पर प्रसन्न ही गए ओर उसके पति को जीवनदान देकर उसे आरोग्य करने के पश्चात धन सम्पति से युक्त कर दिया इस प्रकार जो कोई चल कपट को त्याग कर श्रद्धा भक्ति से चतुर्थी का व्रत करेंगे वे सब प्रकार से सुखी होते हुए क्लेशों से मुक्त हो जाएंगे।

करवा चौथ व्रत का उद्यापन

उजमन करने के लिए एक थाली में तरह जगह चार-चार पूड़ी और थोड़ा सा सीरा रख लें और कुछ दक्षिणा रख लें। उसे थाली के चारों ओर रोली, चावल, से हाथ फेर कर अपनी सासु जी के पाँव को छू कर सब उन्हें दे दें। उसके बाद तरह ब्राह्मणों को भोजन करवा कर दक्षिणा दे कर विदा करें।
इसके बाद पति से आशीर्वाद लें। उन्हें भोजन कराएं और स्वयं भी भोजन कर लें।

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