संतान रक्षा का अहोई अष्टमी व्रत

अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को किया जाता है। इस दिन माताईयेँ अपने बच्चों की सुरक्षा व दीर्घायु के लिए सारा दिन उपवास करतीं हैं ओर शाम को अहोई माता की पूजा व कथा करके व्रत का अनुष्ठान करतीं हैं। अहोई माता के चित्र में सम्पूर्ण संसार को संजोया हुआ दिखाया गया है। रात्रि में तारे को अर्घ्य देकर व्रत को खोल जाता है। व्रत खोलने के उपरांत व्रत करने वाली माताओं को अपनी सास का आशीर्वाद लेकर व व्रत का सामान उनको देकर अपने व्रत को पूरा करना चाहिए। 

व्रत की कथा

एक समय की बात है दतिया नाम के नगर में चंद्र भान नाम का एक सेठ रहता था। उसकी पत्नी चन्द्रिका नाम की उसकी पत्नी जो की बहुत सुंदर, गुणवान, चरित्रवान थी दोनों धन सम्पदा से तृप्त थे लेकिन उनकी कई संताने हुईं लेकिन दीर्घायु न होने के कारण शीघ्र ही मृत्यु को  प्राप्त हो जाती थीं।   इस कारण पति-पत्नी बहुत दुखी थे। एक दिन दोनों बहुत दुखी होकर सब कुछ छोड़ कर जंगल में रहने के लिए चल पड़े। चलते-चलते पति-पत्नी ने बद्रिका नाम के एक आश्रम के पास शीतल कुंड के किनारे पहुँच कर वहां मरने का मन बना कर अन्न-जल त्याग कर बैठ गए। इस कारण कुछ समय बीत जाने के कारण आकाशवाणी हुई की तुम अपने प्राण मत त्यागो यह दुःख तुम्हें पूर्व जन्मो में हुए पापों के कारण मिला है ओर कहा की सेठ अब तू अपनी पत्नी से आने वाली कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को व्रत करवाना जिसके कारण से अहोई नाम की देवी प्रकट होकर आप दोनों के पास आएगी। तुम उनसे अपने पुत्रों की दीर्घायु की कामना करके व्रत के दिन रात को राधा कुंड में स्नान करना। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि आने पर चन्द्रिका ने बड़ी श्रद्धा से अहोई देवी का व्रत किया ओर रात को सेठ ने राधा कुंड में जाकर स्नान करके वापिस आ रहा था तो रास्ते में अहोई देवी ने दर्शन देकर कहा की मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। कुछ भी वर मांग लो तुम्हारी कामना पूरी होगी। सेठ ने देवी माँ के दर्शन पा कर माँ से अपने बच्चों की दीर्घायु का वर माँगा की उसके बच्चों की आयु दीर्घायु हो। तब अहोई माँ वर देने के बाद अदृश्य हो गयीं। कुछ समय के बाद सेठ के घर पुत्र का जन्म हुआ तथा बड़ा होकर शक्तिशाली तथा प्रतापी व दीर्घायु हुआ। इस महिमा के  कारण माँ अहोई के व्रत का विधान बना। उसी दिन से अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए सभी माताएँ  व्रत करती हैं तथा दीर्घायु की कामना करतीं हैं। अहोई माता का व्रत करने से दीर्घायु की प्राप्ति होती है।  

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